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स्वतन्त्रत भारत के 70 साल: यू-एम के विशेषज्ञ चर्चा कर सकते हैं

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15 अगस्त को भारत 70 साल आजादी का जश्न मनाएगा। मिशिगन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ टिप्पणी करने के लिए उपलब्ध हैं कि विभाजन और पिछले सात दशकों का आज के भारत पर क्या प्रभाव पडा है।

लीला फर्नांडीस, राजनीति विज्ञान और वुमन स्टडीज़ की प्रोफेसर है, वे राजनीति और संस्कृति के बीच संबंधों, भारत में श्रमिक राजनीति, लोकतंत्रीकरण और आर्थिक सुधार की राजनीति पर शोध करती है।

"कलोनीअल शासन के हानिकारक प्रभावों के बाद, भारत ने स्थिर लोकतंत्र पर महत्वपूर्ण आर्थिक प्रगति की है," उन्होनें कहा। "आज भी भारत विश्व मामलों में एक केंद्रीय अभिनेता है।

"भारत की चुनौती यह हैं कि इसकी कई सफलताएं सभी नागरिकों को लाभान्वित करे। इसका मतलब सामाजिक और आर्थिक असमानता को स्थायी रूप से संबोधित करके और अल्पसंख्यक समुदायों को पूर्ण रूप से समान अधिकार दे जो स्वतंत्र भारत के संविधान में निहित हैं। "

संपर्क करें: 734-780-7514, This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.


अश्विन पुनाथंबेकर कम्यूनकेशन स्टडीज़ में सहयोगी प्रोफेसर है , वे दक्षिण एशिया में मीडिया अभिसरण, मीडिया इतिहास और सार्वजनिक संस्कृति पर शोध करते हैं।

"इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया में भारत सबसे जीवंत मीडिया इन्डस्ट्री में से एक है," उन्होंने कहा। "1991 के आर्थिक सुधारों ने एक मीडिया क्रांति की शुरूआत की, जो कि पिछले दो दशकों में, प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन के बीच एक गतिशील व्यावसायिक मीडिया परिदृश्य बनाया है जिसमे मोबाइल और डिजिटल क्षेत्रों भी शामिल है। लेकिन देश के विभिन्न क्षेत्रों में मीडिया आउटलेट्स और प्लेटफार्मों की विशाल संख्या को गिनना काफी नही हैं।

"जो कहानियों को हम सुनते हैं और बताते हैं, वो लोगों और समुदायों के प्रतिनिधित्व को दिखाता हैं, और घटनाएं जिन पर हम ध्यान देते हैं वे एक समृद्ध, अौर फ्लॉड मीडिया पर्यावरण पर निर्भर करता हैं।

"एक स्वतंत्र, सार्वजनिक मीडिया के बिना, व्यावसायिक मीडिया संगठन शासनों को उत्तरदायी नहीं बनाता है। मीडिया पेशेवरों ने अपनी कंपनियों में विविधता लाने के लिये अधिक काम नही किया है, जिसके परिणामस्वरूप अल्पसंख्यको की आवाज नजरअंदाज हो गई हैं।"

"वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था ने एक संकुचित राष्ट्रवाद के प्रति जनमत बनाने के प्रयासों को तेज किया है। सरकार आलोचक पत्रकारों और अन्य लोगों को शांत करने से या भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान जैसे प्रमुख संस्थाओं में विचारकों की नियुक्ति से, स्पष्ट रूप से सार्वजनिक प्रवचन को निर्धारित करने की राह ली है।

"निस्संदेह, वहाँ नागरिक समाज समूहों और जनसाधारण मीडिया संगठन हैं जो इस का सामना करने का अथक प्रयास कर रहे हैं। कभी-कभी दर्शक और प्रयोक्ता रचनात्मक तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करते है (उदाहरण के लिए, पैरोडी और व्यंग्य के माध्यम से)। लेकिन आज भारत में, धार्मिक और जाति रेखाओं पर पोलरिज़ैशन को देखते हुये हमें खुले और सत्कार शील मीडिया पर्यावरण की आवश्यकता है। "

संपर्क करें: 734-615-0949, This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.


हफ़्शा कंजवाल इतिहास और वुमन स्टडीज़ में डॉक्टरेट छात्र हैं। उनका शोध कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को देखता है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र है।

"विभाजन पर चर्चा में कश्मीर को अक्सर अनदेखा किया जाता है," उन्होंने कहा। "यह भारत और पाकिस्तान के बीच लगातार विरोध और शत्रुता के मुख्य कारणों में से एक है, लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता के समय कश्मीर का भी 'विभाजन' किया गया था। दोनों देशों के बीच युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्व -47 जम्मू और कश्मीर को वर्तमान भारतीय-नियंत्रित और पाकिस्तान-नियंत्रित क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। परिवारों को विभाजित किया गया, गांवों को आधे में काटा गया और आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और भावनात्मक संबंधों में बाधा उत्पन्न हुई।"

"इसके अलावा, कश्मीर आसानी से विभाजन के बयानों में शामिल किया जाता हैं, लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि यह भी बदलाव का सामना कर रहा था- जैसे कि डोगरा राजशाही के खिलाफ स्वदेशीय विरोध आंदोलन जड ले रहा था। आज के कश्मीर में 1 9 47 के पल हैं- डोगरा या '47 के बाद की राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों का विरोध ।

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दाना कॉर्नबर्ग समाजशास्त्र में डॉक्टरेट छात्र है। उनका शोध भारत के अनौपचारिक कचरा संग्रह और स्क्रैप-रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था में आर्थिक जीवन की जांच करता हैं।

"अगर भारत को स्थापना के समय कृषि और औद्योगिक के बीच फाड़ा गया था, तो 21 वीं सदी की राष्ट्रीय परियोजना निश्चय ही अर्बन है"। "दोनों बड़े और छोटे शहरों के अल्प बुनियादी ढांचे में साधारण लोगों ने आवास, पानी, प्रकाश और कचरा संग्रहण जैसी सेवाएं प्रदान करने के लिए अपना सिस्टम बनाया है।

"भारत शहरी जीवन के पूर्व-विद्यमान, परिचित रूपों को न केवल प्रदर्शित कर रहा है बल्कि उनकी ज़िंदगी लगातार दुनिया के शहरी ज्ञान पर चुनौती दे रहा है कि वे कैसे आश्रय की तलाश करते हैं, रोजगार ढूंढते हैं या रोज़गार बनाते हैं, और बुनियादी सेवाओं तक पहुंचते हैं या प्रदान करते हैं। 2017 में भारत हजारों शहरों का स्थान है जो एक साथ निजी और पारिवारिक हैं, और गहरी आकांक्षा के साथ-साथ अकादमिकता और खतरे से चिह्नित हैं। "

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