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घातक वायरसों से बचाएगा केला

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穿白大褂医生拿着一串香蕉。 (股票图像)एन आर्बर-केला आपको डॉक्टरो को दूर नहीं रख सकता है, लेकिन मिशिगन यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार , केले में पाये जाने वाला एक पदार्थ - वैज्ञानिकों द्वारा संपादित के बाद - वायरस से लड़ सकता है।

वायरस से लड़ने वाला फ़ार्म वैज्ञानिकों को और भी दवाइयाँ विकसित करने में मदद करेगा। यह प्रक्रिया हमारी कोशिकाओं द्वारा संवाद के लिए उपयोग किए जाने वाले "चीनी कोड" का प्रयोग करती है जिसका वायरस और अन्य आक्रमणकारियों अपहरण कर लेते है।

वैज्ञानिकों के अनुसार केला में पाया जाने वाला "बनाना लेक्टिक" या "बैनलेक प्रोटीन" वायरस और कोशिकाओं के शुगर को बाहर से "पढ़ता है"। पांच साल पहले वैज्ञानिकों ने दिखाया था कि यह एड्स के वायरस को कोशिकाओं मे जाने से रोकता है कि लेकिन इससे साइड इफेक्ट भी हो सकता है । यह रसायन ऐसा बायोलोजिकल बैरियर बनेगा जो किसी भी बाहरी वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोकेगा।

सेल पत्रिका में वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा प्रकाशित अध्ययन बैनलेक के नये रूप के बारे मे बताते है जो चूहों में वायरस से लडता हैं लेकिन कोई जलन या अवांछित सूजन नहीं करता है।
अणु का कई मायनों से अध्ययन के बाद, विज्ञानिकों ने साइड इफेक्ट को ट्रिगर करने वाले छोटे से भाग को निर्धारित किया। फिर जीन बदलकर, उन्होनें H84T नामक नया बैनलेक बनाया।

परिणाम: बैनलेक का एक रूप जो सूजन बिना एड्स, हेपेटाइटिस सी और इन्फ्लूएंजा के वायरस के खिलाफ काम कर सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि H84T बैनलेक फ्लू वायरस से चूहों की रक्षा कर सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन मेडिकल स्कूल के डॉ. डेविड मार्कोविज का कहना है कि हम इस खोज को लेकर बेहद उत्साहित हैं क्योंकि ये बनलेक रसायन बड़े पैमाने पर एंटीवायरल स्पेक्ट्रम का विकास करेगा जो कई बड़ी बिमारियों के इलाज करने में सहयोगी बनेगा। "पहली बार एक लेक्टिन अणु की इंजीनियरिंग और फिर संरचना रोमांचक है।"

वैश्विक समस्या के लिये वैश्विक हल

जर्मनी, आयरलैंड, कनाडा, बेल्जियम और अमेरिका- से 26 वैज्ञानिकों की टीम ने से कई वर्ष काम कर पता लगाया कि बैनलेक वायरस के खिलाफ कैसे काम करता है। शोध को अमेरिका और यूरोपीय सरकारों द्वारा और फाउन्डैशन्ज़ द्वारा वित्त पोषित किया गया।

यू-एम स्ट्रक्चरल बायोलॉजी केंद्र द्वारा इस्तेमाल किये गये एक्स-रे तकनीक जैसे वैज्ञानिक उपकरणों के साथ उन्होंने बैनलेक के हर परमाणु के मूल और नए रूपों में हर एक स्थान का पता लगाया।

प्रयोग के दौरान यह सामने आया कि बैनलेक एचआईवी वायरस के शर्करा कणों पर चिपक जाता है और फिर अपना प्रभाव छोड़ते हुए वायरस को तेजी से प्रतिरक्षी तंत्र से बाहर कर देता है। और शरीर की यह प्रतिरक्षा प्रणाली फिर "सबसे पहले प्रतिक्रिया" में संकेत देती है जिससे जलन और अन्य दुष्प्रभाव ट्रिगर होता है।

यह समझ ने उनको बैनलेक के अणु के जीन को बदलने की अनुमति दी। नये बैनलेक ने भी कोशिकाओं से वायरस को बाहर रखा, लेकिन प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया को रोक दिया।

मानवो में बैनलेक के परीक्षण से पहले अभी अनुसंधान के कई साल हैं। लेकिन मार्कोविज और वरिष्ठ सह-लेखक हाशिम अल-हाशिमी जो ड्यूक विश्वविद्यालय के जैव रसायन विभाग के प्रोफेसर और यू-एम में रसायन शास्त्र और बायोफिज़िक्स के पूर्व प्रोफेसर हैं, आशा करते है कि उनके टीम का काम एंटीवायरल दवाओं की कमी को, खासकर इन्फ्लूएंजा जैसे वायरस के खिलाफ जो तेजी से परिवर्तन के करते है काम कर सकेगा।

उन्होंने कहा कि जब इस प्रोटीन से पूरी तरह से इलाज किया जाने लगेगा तो इससे टैमीफ्लू जैसी विषाणुरोधी दवा का इस्तेमाल खत्म हो सकता है जो गंभीर रूप से बीमार रोगियों में प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं।
डॉ. डेविड मार्कोविज ने कहा कि, " हम आशा करते है कि बैनलेक आपात महामारी प्रतिक्रिया, और सैन्य सेटिंग्स जैसी स्थितियों में उपयोगी हो सकता है जब एक अज्ञात लेकिन वायरल कारण का संदेह हो।"

टीम ने चूहों और ऊतकों के नमूनों में अन्य वायरस के खिलाफ H84T बैनलेक का परीक्षण जारी रखा है।